HighCourt Decision: डिवोर्स की शर्त न मानने पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, इंसाफ के लिए ये जरूरी
Divorce Case: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महिला को अदालत की अवमानना के आरोप में एक महीने की सजा सुनाई है। यह मामला एक तलाक से संबंधित था, जिसमें महिला ने अपने पति के साथ एक समझौते के तहत वन टाइम तलाक (one-time divorce) की सहमति दी थी...

Top Haryana: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महिला को अदालत की अवमानना के आरोप में एक महीने की सजा सुनाई, क्योंकि वह अपने पति के साथ किए गए वन टाइम तलाक के समझौते की शर्तों से मुकर गई थी। हालांकि, कोर्ट ने महिला को एक आखिरी मौका देते हुए उसकी सजा को निलंबित कर दिया और उसे आदेश दिया कि वह समझौते की शर्तों का पालन करे, अन्यथा उसे तिहाड़ जेल भेजा जाएगा।
समझौता और विवाद:
यह मामला एक तलाक से संबंधित था, जिसमें महिला और उसके पति ने आपसी सहमति से एक समझौता किया था। इस समझौते के तहत पति ने पत्नी को एकमुश्त रकम दी और दोनों के बीच लंबित आपराधिक मामलों को समाप्त करने पर सहमति बनी थी। लेकिन महिला ने समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया और दस्तावेजों पर साइन करने से इनकार कर दिया। इससे समझौते का पूरा ढांचा टूट गया।
कोर्ट का आदेश:
हाईकोर्ट ने कहा कि महिला जानबूझकर समझौते को तोड़ रही है और इसे अदालत की अवमानना माना। अदालत ने इसे गंभीरता से लिया और कहा कि अगर समझौतों का पालन नहीं किया गया, तो यह न्यायिक प्रणाली पर विश्वास को नुकसान पहुंचाएगा। इसके बाद, कोर्ट ने महिला पर 2000 रुपये का जुर्माना लगाया और चेतावनी दी कि अगर वह यह जुर्माना नहीं भरती, तो उसे अतिरिक्त 15 दिन की सजा भुगतनी पड़ेगी। इसके साथ ही, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अगर महिला ने समझौते का पालन नहीं किया तो उसे तिहाड़ जेल भेजा जाएगा।
सजा का निलंबन और आखिरी मौका:
हालांकि, कोर्ट ने महिला को एक महीने की सजा सुनाई, लेकिन उसे इस सजा को निलंबित कर दिया और कहा कि अगर वह समझौते की शर्तों को मानती है, तो उसे सजा से बचने का अवसर मिलेगा। यदि महिला ने आगे कोई कदम नहीं उठाया, तो अदालत के रजिस्ट्रार को उसे हिरासत में लेने का निर्देश दिया गया।
कोर्ट का दृष्टिकोण:
न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा ने अपने फैसले में कहा कि इस प्रकार के मामलों में समझौतों से पीछे हटना अदालत की अवमानना को बढ़ावा देता है और यह न्यायपालिका के प्रति अविश्वास पैदा कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अदालत का आदेश स्पष्ट और अवज्ञा से ऊपर होता है और समझौते का उल्लंघन असहनीय है।